किसी भी एजेंसी को कंप्यूटर से गुप्त जानकारी हासिल करने की अनुमति नहीं दी गई: गृह मंत्रालय

10 एजेंसियों द्वारा किसी भी कंप्यूटर से सूचना को हासिल करने की अनुमति देने के सरकार के फैसले को लेकर छिड़ी राजनीतिक बहस के बीच, गृह मंत्रालय (एमएचए) ने स्पष्ट किया है कि किसी भी एजेंसी को पूर्व अनुमोदन के बिना ऐसी चीजें करने के लिए पूर्ण अधिकार नहीं दिए गए हैं।

MHA के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, किसी भी प्रणाली की निगरानी करने के लिए, अधिकारियों को मौजूदा नियमों का पालन करना होता है और इस तरह की कार्रवाई करते हुए उन नियमों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है।

यह कोई नया कानून, कोई नया नियम, कोई नई प्रक्रिया, कोई नई एजेंसी, कोई पूर्ण शक्तियां, कोई पूर्ण प्राधिकरण नहीं है और यह पुराना कानून है, वही नियम, वही प्रक्रिया और वही एजेंसी है, अधिकारी ने कहा।

केंद्र सरकार यह बताती रही है कि यह अधिसूचना और इसमें उल्लिखित नियमों और 10 एजेंसियों को यूपीए के नेतृत्व वाली सरकार में जारी किया गया था और यह वर्ष 2011 से ही कार्रवाई में है।

नया आदेश केवल निर्दिष्ट एजेंसियों को अधिसूचित करने पर प्रकाश डालता है जो इस तरह की कार्यवाही को अंजाम दे सकते हैं, अधिकारी द्वारा पीटीआई को बताया गया।

एमएचए ने अपनी बात को समझाने के लिए आईटी के नियम 4 (अवरोधन, निगरानी और सूचना के एन्क्रिप्शन के लिए प्रक्रिया और सुरक्षा) नियम 2009 का भी उपयोग किया।

20 दिसंबर को, मंत्रालय के आदेश ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो एवं अन्य जैसी 10 एजेंसियों को अधिकृत किया था, जो इस तरह के ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं।

जहाँ केंद्र सरकार के इस फैसले को राजनीतिक दलों और कानूनी विशेषज्ञों से आलोचना का सामना करना पड़ा था, वहीं कैबिनेट मंत्री अरुण जेटली ने इस कदम का बचाव किया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार इस आदेश में सुरक्षा उपाय शामिल हैं।

इस अधिसूचना ने देश में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसमें विपक्ष ने केंद्र सरकार पर भारत को निगरानी राज्य बनाने के प्रयास का आरोप लगाया है।

सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना के तुरंत बाद, अधिवक्ता एमएल शर्मा ने गृह मंत्रालय के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका दायर की है।

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